किताबों से कभी गुजरो तो


 

"किताबों से कभी गुज़रो तो यूँ किरदार मिलते हैं
गए वक़्तों की ड्योढ़ी में खड़े कुछ यार मिलते हैं

जिसे हम दिल का वीराना समझकर छोड़ आये थे
वहाँ उजड़े हुए शहरों के कुछ आसार मिलते हैं"

ये बोल है नब्बे के दशक के  मध्यांतर से तनिक पहले  गुलज़ार द्वारा निर्देशित धारावाहिक "किरदार" के शीर्षक गीत के जिसे  जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज दी और इन बोलों  को अत्यंत रम्य धुन में बांधा.

जो हैं नही उन यारों की नाराज़गी और किताबों से ऊब,एक स्वस्थ मनोरंजन की खोज मुझे अपनी उतप्ति यानि के अपनी पैदाइश के जमाने में ले गई.

गुलज़ार सहित विभिन्न लेखकों द्वारा लिखी गई गांव और शहर के निम्न वर्गीय और मध्य वर्गीय लोगों की थोड़ी उलझी लेकिन सहज़ और सुलझी हुई छोटी छोटी कहानियों का अंगूर के गुच्छे सा  खट्टा मीठा धारावाहिक "किरदार".

गुलज़ार साहब ने,सत्तर और अस्सी के दशक में कई बेहद मनोरंजक और संवेदनशील फिल्मों का निर्देशन किया जैसे-परिचय, कोशिश, आंधी, मेरे अपने,और भी कई सारी, इन सब फिल्मों   की कहानी उस समय के सीनेमा में चल रही कहानियों से हट कर एक अलग राह की कहानियाँ थी, चूंकि गुलज़ार साहब खुद साहित्यकार है उनका कहानी चयन भी उत्तम श्रेणी का है, "किरदार" के लिये भी उन्होंने उत्तम, कहानियों का चयन किया.ये सभी कहानियाँ भारतीय  सामाजिक वातावरण के  समाजशास्त्रीय और  दर्शनशास्त्रीय  मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का श्रेष्ठ उदाहरण है.केवल "किरदार" की  ही कहानियाँ नही हर अच्छे कहानीकार की सबसे श्रेष्ठ कहानी के भी  यही गुण होते है.

अब सवाल ये है की मुझे वक़्त में इतना पीछे क्यों जाना पड़ा उसका जबाब वर्तमान के हिंदी  टीवी चैनल और हिंदी फिल्मों से स्वस्थ मनोरंजन की उम्मीद का टूटना है वहाँ नकल और  निरी फुहड़ता के आलावा कुछ है ही नही.

टीवी और फ़िल्में इस कतार में पीछे छूट गई है वहाँ रचनात्मकता का  घोर आभाव  है.

वेब सीरीज के बारे में भी कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन उनके बारे में कुछ न  कहना ही बेहतर है.
वेब सीरीज बनाने वालों ने  विभत्स को ही सारी रचनात्मकता और मौलिकता मान लिया है.
उन्होंने मानना है की विभत्सा ही स्वतन्त्रता है.

ढेरों बिगड़े बोल, ढेर सारा ख़ून और भी इसी तरह की सामग्री को इकट्ठा कर के एक हिट वेब सीरीज बनती है.

संवाद सिर्फ ग़ालियों में होगा, जो गालियां मिर्ज़ापुर में दी जा रही है वही की वही पाताललोक में दी जा रही है,ग़ालियों में न कोई वेरिएशन न कोई इनोवेशन जों की तों. कागज़ पर  इनकी कहानी तीस से चालीस फीसदी सभी में एक सी ही होती है.

पंचायत और स्कैम 1992 को छोड़ दे तो कोई नई और स्वस्थ रचनत्मकता यहाँ आई नही है.

खैर कोई बात नही मैं तो चला अतीत में पीछे.लेकिन  यूँ अतीत का गाना गाते समय इस बात का ध्यान रखना होगा की अतीत न तो सम्पूर्ण  सुन्दर  है और न ही नितांत असुन्दर.वैसे भी कालिदास ने कहा है -
     
          "पुराणमित्येव न साधु सर्वं
    न चाऽपि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
    सन्तः परीक्ष्यान्यतरत् भजन्ते
       मूढ्ः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥"  

                       सतीश मालवीय
         छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल.
मोबाइल न.9479360790
Malviyasatish116@mail.com         

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