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विज्ञापन और संगीत (commercials with music )

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  ) मेरा पसंदीदा ad compaign सर्व शिझा अभियान के तहत स्कूल चले हम है, सुन्दर शब्द सयोजन और सुगम संगीत का मधुर समागम, इसके साथ ही स्कूल जाते अटखेलियां करते बच्चों के चित्र इस विज्ञापन को अप्रितम सुंदरता प्रदान करते है, इस विज्ञापन में संदेश देने के साथ साथ ही  लोगों के मस्तिष्क पर देर तक अपनी  गहरी छाप छोड़ने  की अदभुत झमता है. (2) चलिए कुछ अच्छा बनाते है lets make it good (dominos pizza ) मेरा मतलब है एक एडवरटाइजमेन्ट  बनाते है, दो लाइन के जिंगल या टैग लाइन से आगे की क्रिएटिविटी की बात करते है, हालांकि दो लाइन  बनाना कोई आसान काम नही है.   तो शुरुआत करते है अमूल से   "ज़रा सी ख़ुशी प्यार ज़रा सा, हो ज़रा सी अनबन दुलार ज़रा से, यही तो अमूल है स्वाद इंडिया का, अमूल "the test of india" देखिये न इस एक मिनट तीस सेकंड के विज्ञापन ने शुरुआत आप से की और सारे देश को अपने में समेट लिया.  अब ऐसे ही  कुछ और विज्ञापनों पर नज़र डालते है जैसे  *पेराशूट एडवांस का नया विज्ञापन शायद इस विज्ञापन को निर्माताओं ने नवयुतियों को ध्यान में रख के बनाया ह...

मस्का पाँव रिश्ते

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 किसी भी रिश्ते में लोग आजकल जोड़ाव के बनिस्पद अलगाव में ज्यादा रूचि रखते हैं. लोग आपसे लगाव विशेष उद्देश्य की पूर्ति तक ही रखते हैं.जैसे ही उनकी उद्देश्य पूर्ति होती है वो पहली फुर्सत में तुरंत फुरन्त अपने अंदर अलगाव की भावना जगा बैठते हैं वो भी इतनी भीषण की कहते हैं आजके बाद मैं तुम्हारी सकल-बकल नही देखना चहता/चाहती. ये आज कल का सबसे प्रचलित फैशन हो गया है.ये फैशन तब तक ही सार्थक होता रहता है जब तक उन अलगाव वादियों का निशाना सही ठिकाने पर लगता रहता है, अगर किसी दिन भी निशाना चूका तो इन्हे लेने के देने पड़ सकते हैं. लेकिन ऐसा होता कभी नही क्योंकि ईश्वर ने इस जगत में अंधेर के लिये थोड़ी जगह छोड़ रखी है.इस सब के पीछे इनकी भारी भरकम प्लानिंग होती है. वो आपकी ज़िन्दगी के ग्लूकोज में शक्कर की तरह मिलने की कोशिश करते हैं और मिल भी जाते हैं, मीठा किसको पसंद नही?इसमें आपकी गलती नही है बिलकुल भी।वो आपकी ज़िन्दगी में आते ही इस तरह हैं कि आपको सब कुछ भला भला सा लगता है. मस्का पाव यानी पाव का मस्का उनका मैन हथियार होता है. उनकी बातों में इतना मस्का होता है कि जितना मुंबई के किसी ईरानी रेस्टोरेंट...

पुष्प की अभिलाषा

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  राष्ट्रीय चेतना का जागरण करने वाले साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी पंडित माखन लाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता "पुष्प की अभिलाषा "के सौ वर्ष. --------------------------- बसंत पंचमी बहुत ही कोमल भावनाओं को प्रकट करने का एक अवसर है, सौ वर्ष की कलावधि में कितने ही साहित्यकार हुए होंगें उन्होंने कितनी ही रचनाए कि होंगीं जो आज स्मरण नही हैं और "पुष्प की अभिलाषा"क्यों स्मरण है इन दोनों के बीच जो अंतर है यदि हम समझ सकें तो हम भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे. यह विचार अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित "पुष्प की अभिलाषा "के सौ वर्ष विशेष प्रसंग और सरस्वती पूजन,साहित्यिक विमर्श का शुभारम्भ एवं बसंत उत्सव का उद्घाटन के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रकट किये. साथ ही उन्होंने "पुष्प की अभिलाषा" कविता में पुष्प के समर्पण भाव को उद्धरित करते हुए कहा की जीवन की जो सर्वोच्च अवस्था होती है वो है समर्पण, भारतीय संस्कृति और हमारे जीवन में जो सर्वोच्च अव...

जीवन और कविता

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  व्यवहारिकता के धक्के से कल्पना के महल ढोलने लगते है.कविता जब जीवन के आमने- सामने आ जाती तब उसे भागने की राह नही सूझती. पलायन का कुंज ही एक ऐसा स्थान है जहाँ कविता,सच्चाई से मुँह फेरकर, अपना सुख और सुहाग मना सकती है.जीवन जब उसकी आँखों में आँखें डालकर देखने लगता है तब सचमुच ही, घबराहट को छोड़ उसे कोई भाव नही सूझते.

जयशंकर प्रसाद

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 मनुष्य ह्रदय भी एक रहस्य है,एक पहेली है.जिस पर क्रोध से भैरव हुंकार करता है, उसी पर स्नेह का अभिषेक करने के लिये प्रस्तुत है.उन्माद!और क्या है?मनुष्य क्या इस पागल विश्व के शासन से अलग होकर कभी   निश्चेष्टता नही ग्रहण कर सकता? हाय रे मानव!क्यों इतनी दुरभिलाषाऐं बिजला  की तरह तू अपने ह्रदय में अलौकित करता है?
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 जीवन में जीवन के प्रति उदासीनता कभी काम नहीं देती. एक रास्ता है जो तय करना अनिवार्य है इसमें दिन में भी रात सा अंधेरा महसूस होता है छाँव का नाम नहीं तमाचे सी धूप चहरे पर पढ़ती है नितांत एकांत सन्नाटा बिखरा है इस रास्ते को तय करते हुए ऐसा मालूम होता है जैसे किसी कंद्रा में धसे जाने का सफर तय कर रहा हूँ उजाले धीरे-धीरे पीछे छोट गए है और आगे सूचीभेद अंधकार मेरा इंतज़ार कर रहा है यहाँ तक आने के लिए ये सफर तय करना अनिवार्य था यही तो मेरा जीवन था.

संगीत

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  ये लेख केवल उन कलावंतों के नाम जो सदैव सुरीले और रसीले संगीत का स्पंदन अपने कर्णकुहरों महसूस करना चाहते है, जो ध्वनि माधुर्य को पहचानते हैं अर्थात वे जो स्वर, राग, ताल के अद्भुत समाहार से परिचित है. मेरा कहना है की ये कोई लेख या निबंध है ही नही है ये तो केवल एक मनोहार है उनसे जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के रस से अभी तक अपरिचित है. मैं ये नही कहता की आप भारतीय शास्त्रीय संगीत से बिलकुल अनभिज्ञ है लेकिन इसकी उपेझा तो करते ही है क्यों कि आप इससे जल्दी ऊब जाते है बनिस्पद फिल्मीं संगीत के. फ़िल्मी संगीत जो शब्द प्रधान है और स्वर लहरियों पर शब्दों की अटखेलियों के मिश्रण से निर्मित होता है, ये समझने में आसान है, इसमें शब्दों के अर्थों की गांठे धीरे धीरे खुलती है और इनका मोहक शब्द चयन हमारे मर्म को गुदगुदा जाता है. इसमें हम केवल आसानी से समझ में आ सकने वाली स्वर धारा की तरफ नही खींचते बल्कि उसके द्वारा शब्द और अर्थ के माध्यम से जो सम्प्रेषण होता है उसे हम अपने हिये में बिठा लेते है. वहीं शुद्ध शास्त्रीय संगीत केवल ध्वनि प्रधान है. इसका सुख केवल और केवल विशिष्ट ध्वनि के  अभ्यस्त कान ही ...