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Showing posts from January, 2021

जयशंकर प्रसाद

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 मनुष्य ह्रदय भी एक रहस्य है,एक पहेली है.जिस पर क्रोध से भैरव हुंकार करता है, उसी पर स्नेह का अभिषेक करने के लिये प्रस्तुत है.उन्माद!और क्या है?मनुष्य क्या इस पागल विश्व के शासन से अलग होकर कभी   निश्चेष्टता नही ग्रहण कर सकता? हाय रे मानव!क्यों इतनी दुरभिलाषाऐं बिजला  की तरह तू अपने ह्रदय में अलौकित करता है?
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 जीवन में जीवन के प्रति उदासीनता कभी काम नहीं देती. एक रास्ता है जो तय करना अनिवार्य है इसमें दिन में भी रात सा अंधेरा महसूस होता है छाँव का नाम नहीं तमाचे सी धूप चहरे पर पढ़ती है नितांत एकांत सन्नाटा बिखरा है इस रास्ते को तय करते हुए ऐसा मालूम होता है जैसे किसी कंद्रा में धसे जाने का सफर तय कर रहा हूँ उजाले धीरे-धीरे पीछे छोट गए है और आगे सूचीभेद अंधकार मेरा इंतज़ार कर रहा है यहाँ तक आने के लिए ये सफर तय करना अनिवार्य था यही तो मेरा जीवन था.

संगीत

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  ये लेख केवल उन कलावंतों के नाम जो सदैव सुरीले और रसीले संगीत का स्पंदन अपने कर्णकुहरों महसूस करना चाहते है, जो ध्वनि माधुर्य को पहचानते हैं अर्थात वे जो स्वर, राग, ताल के अद्भुत समाहार से परिचित है. मेरा कहना है की ये कोई लेख या निबंध है ही नही है ये तो केवल एक मनोहार है उनसे जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के रस से अभी तक अपरिचित है. मैं ये नही कहता की आप भारतीय शास्त्रीय संगीत से बिलकुल अनभिज्ञ है लेकिन इसकी उपेझा तो करते ही है क्यों कि आप इससे जल्दी ऊब जाते है बनिस्पद फिल्मीं संगीत के. फ़िल्मी संगीत जो शब्द प्रधान है और स्वर लहरियों पर शब्दों की अटखेलियों के मिश्रण से निर्मित होता है, ये समझने में आसान है, इसमें शब्दों के अर्थों की गांठे धीरे धीरे खुलती है और इनका मोहक शब्द चयन हमारे मर्म को गुदगुदा जाता है. इसमें हम केवल आसानी से समझ में आ सकने वाली स्वर धारा की तरफ नही खींचते बल्कि उसके द्वारा शब्द और अर्थ के माध्यम से जो सम्प्रेषण होता है उसे हम अपने हिये में बिठा लेते है. वहीं शुद्ध शास्त्रीय संगीत केवल ध्वनि प्रधान है. इसका सुख केवल और केवल विशिष्ट ध्वनि के  अभ्यस्त कान ही ...

किताबों से कभी गुजरो तो

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  "किताबों से कभी गुज़रो तो यूँ किरदार मिलते हैं गए वक़्तों की ड्योढ़ी में खड़े कुछ यार मिलते हैं जिसे हम दिल का वीराना समझकर छोड़ आये थे वहाँ उजड़े हुए शहरों के कुछ आसार मिलते हैं" ये बोल है नब्बे के दशक के  मध्यांतर से तनिक पहले  गुलज़ार द्वारा निर्देशित धारावाहिक "किरदार" के शीर्षक गीत के जिसे  जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज दी और इन बोलों  को अत्यंत रम्य धुन में बांधा. जो हैं नही उन यारों की नाराज़गी और किताबों से ऊब,एक स्वस्थ मनोरंजन की खोज मुझे अपनी उतप्ति यानि के अपनी पैदाइश के जमाने में ले गई. गुलज़ार सहित विभिन्न लेखकों द्वारा लिखी गई गांव और शहर के निम्न वर्गीय और मध्य वर्गीय लोगों की थोड़ी उलझी लेकिन सहज़ और सुलझी हुई छोटी छोटी कहानियों का अंगूर के गुच्छे सा  खट्टा मीठा धारावाहिक "किरदार". गुलज़ार साहब ने,सत्तर और अस्सी के दशक में कई बेहद मनोरंजक और संवेदनशील फिल्मों का निर्देशन किया जैसे-परिचय, कोशिश, आंधी, मेरे अपने,और भी कई सारी, इन सब फिल्मों   की कहानी उस समय के सीनेमा में चल रही कहानियों से हट कर एक अलग राह की कहानियाँ थी, चूंकि गु...

क्रांति की धुरी

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 किसान आंदोलन भारत में क्रांति की धुरी किसान वर्ग है, कुछ लोग  दूर बैठ कर आंदोलन की आग से हाथ ताप रहे है और इस सर्दी का मज़ा ले रहे है, जैसे ही उनका मज़ा खत्म होगा वे यही आग इन्ही किसानों और मज़दूरों के पेट पर उलीच देंगे, इस आंदोलन को पूरी तरह किसान आंदोलन समझने का धोखा नही खाना चाहिए यहाँ कई सारी कठपुतलीयां नाच रही है और कई सारे कटमुल्ले बिरयानी परोस रहे है.हमारा देश हर समय कई विषमताओं से जूझता रहता है, सरकार को असल किसान और मज़दूर की विषमता को भी समझना चाहिए, मज़दूर और किसान की भीड़ में बैठे रहना ही उनका समर्थन नही है. उनकी रोज़ की देनदिनी की भी खबर रखना जरुरी है.इतिहास में देखा गया है की कोई आंदोलन किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रारम्भ होता है, लेकिन उसकी परीनीति किसी और उद्देश्य को प्राप्त करती है.अगर आंदोलन की आत्मा शुद्ध होगी तो वो अवश्य ही अपने   मूल उद्देश्य को प्राप्त करेगा.