"किताबों से कभी गुज़रो तो यूँ किरदार मिलते हैं गए वक़्तों की ड्योढ़ी में खड़े कुछ यार मिलते हैं जिसे हम दिल का वीराना समझकर छोड़ आये थे वहाँ उजड़े हुए शहरों के कुछ आसार मिलते हैं" ये बोल है नब्बे के दशक के मध्यांतर से तनिक पहले गुलज़ार द्वारा निर्देशित धारावाहिक "किरदार" के शीर्षक गीत के जिसे जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज दी और इन बोलों को अत्यंत रम्य धुन में बांधा. जो हैं नही उन यारों की नाराज़गी और किताबों से ऊब,एक स्वस्थ मनोरंजन की खोज मुझे अपनी उतप्ति यानि के अपनी पैदाइश के जमाने में ले गई. गुलज़ार सहित विभिन्न लेखकों द्वारा लिखी गई गांव और शहर के निम्न वर्गीय और मध्य वर्गीय लोगों की थोड़ी उलझी लेकिन सहज़ और सुलझी हुई छोटी छोटी कहानियों का अंगूर के गुच्छे सा खट्टा मीठा धारावाहिक "किरदार". गुलज़ार साहब ने,सत्तर और अस्सी के दशक में कई बेहद मनोरंजक और संवेदनशील फिल्मों का निर्देशन किया जैसे-परिचय, कोशिश, आंधी, मेरे अपने,और भी कई सारी, इन सब फिल्मों की कहानी उस समय के सीनेमा में चल रही कहानियों से हट कर एक अलग राह की कहानियाँ थी, चूंकि गु...