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पुष्प की अभिलाषा

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  राष्ट्रीय चेतना का जागरण करने वाले साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी पंडित माखन लाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता "पुष्प की अभिलाषा "के सौ वर्ष. --------------------------- बसंत पंचमी बहुत ही कोमल भावनाओं को प्रकट करने का एक अवसर है, सौ वर्ष की कलावधि में कितने ही साहित्यकार हुए होंगें उन्होंने कितनी ही रचनाए कि होंगीं जो आज स्मरण नही हैं और "पुष्प की अभिलाषा"क्यों स्मरण है इन दोनों के बीच जो अंतर है यदि हम समझ सकें तो हम भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे. यह विचार अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित "पुष्प की अभिलाषा "के सौ वर्ष विशेष प्रसंग और सरस्वती पूजन,साहित्यिक विमर्श का शुभारम्भ एवं बसंत उत्सव का उद्घाटन के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रकट किये. साथ ही उन्होंने "पुष्प की अभिलाषा" कविता में पुष्प के समर्पण भाव को उद्धरित करते हुए कहा की जीवन की जो सर्वोच्च अवस्था होती है वो है समर्पण, भारतीय संस्कृति और हमारे जीवन में जो सर्वोच्च अव...

जीवन और कविता

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  व्यवहारिकता के धक्के से कल्पना के महल ढोलने लगते है.कविता जब जीवन के आमने- सामने आ जाती तब उसे भागने की राह नही सूझती. पलायन का कुंज ही एक ऐसा स्थान है जहाँ कविता,सच्चाई से मुँह फेरकर, अपना सुख और सुहाग मना सकती है.जीवन जब उसकी आँखों में आँखें डालकर देखने लगता है तब सचमुच ही, घबराहट को छोड़ उसे कोई भाव नही सूझते.