जयशंकर प्रसाद
मनुष्य ह्रदय भी एक रहस्य है,एक पहेली है.जिस पर क्रोध से भैरव हुंकार करता है, उसी पर स्नेह का अभिषेक करने के लिये प्रस्तुत है.उन्माद!और क्या है?मनुष्य क्या इस पागल विश्व के शासन से अलग होकर कभी निश्चेष्टता नही ग्रहण कर सकता? हाय रे मानव!क्यों इतनी दुरभिलाषाऐं बिजला की तरह तू अपने ह्रदय में अलौकित करता है?

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