संगीत
ये लेख केवल उन कलावंतों के नाम जो सदैव सुरीले और रसीले संगीत का स्पंदन अपने कर्णकुहरों महसूस करना चाहते है, जो ध्वनि माधुर्य को पहचानते हैं अर्थात वे जो स्वर, राग, ताल के अद्भुत समाहार से परिचित है.
मेरा कहना है की ये कोई लेख या निबंध है ही नही है ये तो केवल एक मनोहार है उनसे जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के रस से अभी तक अपरिचित है.मैं ये नही कहता की आप भारतीय शास्त्रीय संगीत से बिलकुल अनभिज्ञ है लेकिन इसकी उपेझा तो करते ही है क्यों कि आप इससे जल्दी ऊब जाते है बनिस्पद फिल्मीं संगीत के. फ़िल्मी संगीत जो शब्द प्रधान है और स्वर लहरियों पर शब्दों की अटखेलियों के मिश्रण से निर्मित होता है, ये समझने में आसान है, इसमें शब्दों के अर्थों की गांठे धीरे धीरे खुलती है और इनका मोहक शब्द चयन हमारे मर्म को गुदगुदा जाता है. इसमें हम केवल आसानी से समझ में आ सकने वाली स्वर धारा की तरफ नही खींचते बल्कि उसके द्वारा शब्द और अर्थ के माध्यम से जो सम्प्रेषण होता है उसे हम अपने हिये में बिठा लेते है.
वहीं शुद्ध शास्त्रीय संगीत केवल ध्वनि प्रधान है. इसका सुख केवल और केवल विशिष्ट ध्वनि के अभ्यस्त कान ही ले सकते है, जबकि फिल्मीं संगीत का सुख अनभ्यस्त कान भी ले सकते है.
फिलहाल इस लेख का चर्चा का मुख्य विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत है हम केवल उसी की चर्चा यहां करेगें.
शास्त्रीय संगीत को ही मार्ग संगीत कहते है यह ध्वनि प्रधान होता है शब्द प्रधान नही इसमें महत्व ध्वनि का होता है उसके उतार चढ़ाव का होता है, शब्द और अर्थ का नही.
लोग इससे स्वाभिक ही ऊब जाते है पर इस "ऊब का कारण संगीत की कमजोरी नही लोगों की जानकारी की कमी है."
जो शास्त्रीय संगीत कई कालों से परिष्कृत होता आया है,जिस कला का दसो साल रोज़मर्रा घंटो गायक या वादक अभ्यास करता है स्वर साधता है वह फिर निश्चय ही एक प्रकार का व्याकरण बन जाता है, और इस व्याकरण को समझे बगैर इसके प्रतीकों को समझे बिना उसका स्वाद पा सकना निःसन्देह कठिन है, आप इसे नही समझ सकते तो इससे संगीत का मान नहीं घटता.
हर इंसान की अपनी पसंदगी-नापसंदगी होती है पर इसके मायने यह नही होता की जिसे आप पसंद नही करते वह बुरा है या उपेझा का पात्र है. भारतीय संगीत की बगिया का हर गायक वादक अलग अलग फुल की तरह है हर एक का रंग, गंध, स्वाद अलहदा है अनोखा है, जरूरी नही की आपको चम्पा अच्छा लगता है तो जूही का फुल घटिया है.
भारतीय शास्त्रीय संगीत जिसे मार्ग संगीत या आजकल हिंदुस्तानी संगीत भी कहते है, भारतीय शास्त्रीय संगीत को हिंदुस्तानी संगीत कहना सही है या गलत इसको मैं आगे स्पष्ट करूँगा. जब तक हम भारतीय संगीत की उत्पति और विकास पर नज़र डाल लेते है,
"कहते है इस सृष्टि की रचना जिस ओमकार के अनाहत नाद से हुई संगीत भी उसी नाद का एक हिस्सा है, ओमकार नाद जो इस चर अचर ब्राह्माण में अनंत काल से गुंजायमान है वही इस सृष्टि और संगीत का मूल तत्व है. इस पर- ब्रह्म ओमकार को सबसे पहले सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने ग्रहण किया फिर उन्होंने भगवान शिव को संगीत का ज्ञान दिया, भगवान शिव जो डमरू के द्वारा नाद का उत्सृजन करते है और तांडव कर संगीत और नृत्य दोनों कलाओं का आनंद पाते है. शिव से श्रीहरि विष्णु के पास संगीत पहुँचा, विष्णु जो शंख धारण करते है और उन्हें शंख का नाद अत्यंत प्रिय है. विष्णु के बाद संगीत, कला और संगीत की अधिष्टात्री वीणावादिनी सरस्वती के पास पहुंचा उनके बाद नारद, गंधर्वों, ऋषियों मुनियों और संगीत के संस्कार से सम्पन्न आम जनों तक संगीत ज्ञान और कला के रूप में पहुंचा.
मौजूदा शास्त्रीय संगीत की उत्पति वैदिक काल से ही मानी जाती है, अपनी हज़ारों वर्ष की प्रगति में यह संगीत अपनी अनोखी स्वर साधना द्वारा एक विशेष संगीत शैली बनाती चली गई. इसका विकास विशेष रीती से विशेष राग और भाव सम्पदा से हुआ. इसकी अपनी रीति, अपने स्वर,लय, ताल, राग हुए और यह कठिन ध्वनि प्रयोग की साधना से मुखरित हुआ. इसके अपने नियम बने और अपनी ही व्याकरण के आधार पर यह गया और समझा जाने लगा.संगीत का संबंध मुख्य रूप से सामवेद से है. सामवेदीय गेय उदात्त अनुदात्त और स्वरित इन तीनों स्वरों से गाये जाते है. सामवेद की ऋचाओं को लयबद्ध गया जाता है यही वैदिक गायन ईश्वर वंदना का सर्वोत्कृष्ट माध्यम था.
विश्व भर के साहित्य में कोई ऐसा ग्रंथ नही है जिसने लोगों के जीवन और चिंतन को रामायण जितना प्रभावित किया हो, रामायण के कई सर्गों में संगीत का उल्लेख किया गया है जैसे किष्किंधा कांड के 28वे सर्ग के श्लोक 36एवं 37 में
श्री रामचंद्र किष्किंधा वन का वर्णन करते हुये लझ्मण जी से कहते हैं - हे लझ्मण देखो भृमरों का गुंजार वीणा के माधुर्य जैसा है. मेढ़क मानो अपने कंठ से ताल के बोल बोल रहे है. मेघ का गर्जन मृदंग के नाद जैसा सुनाई दे रहा है. लगता है वन में संगीत चल रहा है.
इसी प्रकार एक घटना श्रीकृष्ण की बांसुरी से संबंधित है, हुआ यूँ की वृन्दावन में चारों तरफ उदासी छाई थी श्री कृष्ण वृन्दावन छोड़ कर जा रहे थे. उसी वक़्त कुछ दरख्त उनके पैरों से लिपट कर रोने लगे. कृष्ण ने पूंछा तुम कौन हो तो वे बोले हम बांस के दरख्त, आपने हमारी मुरली बना कर हमें होठों से लगाया अधरों पर सजाया अब आप के जाने के बाद लोग हमें ईंधन जान कर जलाएंगे, तब कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया की जब तक इस संसार में आवन जावन लगा है कृष्ण के मानने वाले मौजूद है तुम्हे होठों पर सजाया जाता रहेगा. तो कहानी थी बांसुरी की जिसकी राग वृन्दावन सारंग की धुन मंत्रमुग्ध कर देती है.
शारंग देव ने अपने ग्रन्थ संगीत रत्नाकर के पहले स्वराध्याय में कहा है की संगीत समस्त जीव समूह को आनंद का वरदान देकर अपनी ओर आकर्षित करता है.
जैसे की जब मैं यहाँ बैठा बैठा लेख लिख रहा हूँ कार्तिक मास की नर्म सर्द भोर में मंद मंद हवा पीपल के पत्तों को हिला रही है जिससे पत्तों के आपस में टकराने से एक कर्तल ध्वनि उत्पन्न हो रही, कुछ पझी कलरव कर रहे है ये सब आपस में मिलकर एक अनोखे प्रकृति के संगीत की रचना कर के मेरा उत्साह वर्धन कर रहे है की तुम लिखो, साथ ही मेरे मन पे राग वृन्दावनी सारंग की संतूर और बांसुरी की धुन सवार है जो पिछली रात मैंने सूनी थी. खैर आगे बढ़ते है, जैसा मैंने पहले कहा था की मै आपको बताऊंगा के भारतीय शास्त्रीय संगीत को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत क्यों कहते है. इसके लिये हमें इतिहास की तरफ जाने की आवश्यकता है हुआ कुछ इस तरह था की तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व जब सिकंदर भारत आया तो उसने सात स्वरों से सज़ा भारतीय संगीत सुना और भारतीय संगीत ने सिकंदर का मन मोह लिया, सिकंदर ने अब से पहले कभी सात स्वरों से सुसज्जित संगीत कभी नही सुना था क्यों कि उस समय समस्त पश्चिमी जगत केवल तीन स्वरों वाला संगीत ही प्रचलित था.
सिकंदर को भारतीय संगीत इतना भाया कि वो कुछ संगीतकारों को अपने साथ ले गया, धीरे धीरे भारतीय संगीतकारों की मांग पश्चिम में बहुत बड़ गई, पश्चिम के शासक काफ़ी धन खर्च कर इन्हे अपने यहाँ बुलाते रहे जिससे संगीतकारों के साथ भारतीय संगीत भी पश्चिम पहुंच गया. अब हुआ ये की जब दसवी और ग्यारहवी शताब्दी में जब इस्लामिक आक्रमणकारी सल्तनत और मुग़ल साम्राज्यों के नाम से भारत आये तो तीसरी ईसा पूर्व पश्चिम पहुंचा भारतीय संगीत अपने मूल को खो कर हिंदुस्तानी संगीत के रूप में वापिस भारत आया, इसमें अरबी, फ़ारसी सहित पश्चिम के कई तरह के संगीत की मिलावट हो चुकी थी और भारतीय संगीत का मूल रूप बदल चूका था, संगीत अब साधना की जगह शासकों के भोग विलास की वस्तु बन गई. जो भारतीय संगीत आम जन मानस का ईश्वर तक पहुंचने का साधन था वो अब मंदिरों के स्थान पर शासकों के महलों कैद हो गया, भारतीय संगीत की इस तरह की दुर्गति भारत की आजादी तक जारी रही और भारतीय शास्त्रीय संगीत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत बन गया.
अब मै अपनी मनोहार आपसे फिर से दोहराते हुये कहना चाहता हूँ की हम भारतीयों की संस्कृती और परम्परा हमारी अमूल्य निधि है.
संगीत प्रकृति की सबसे सुन्दर रचना है, भारतीय संस्कृति में संगीत का अपना विशिष्ट महत्व है, संगीत सभी ललित कलाओं में श्रेष्ठतम कला और चतुर्दर्श विधाओं में आत्मानंद के उत्तम साधन के रूप में मानव को मिला है.
संगीत विश्व को दिव्य सौंदर्य प्रदान करता है, मानव मष्तिस्क में नवीन रंग भरता है और भावनाओं रंगीन उड़ान की नयनाभिराम सुषमा और निराशा के प्रांगण में आनंद का प्रपात प्रवाहित करता है तथा विश्व के प्रत्येक पदार्थ में जीवन और उत्साह के अभिन्न स्फुरणों को मुखरित करता है. अंत में मेरी आपसे यहीं याचना है की आप संगीत को अपनाये अपनी संस्कृति और परम्परा को सहेज़े.
नमस्कार🙏.
सात स्वरों को सात समुन्दर कहे हरि दास, स्वर ईश्वर के रूप है हर एक में है आस.

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