जीवन और कविता


 

व्यवहारिकता के धक्के से कल्पना के महल ढोलने लगते है.कविता जब जीवन के आमने- सामने आ जाती तब उसे भागने की राह नही सूझती. पलायन का कुंज ही एक ऐसा स्थान है जहाँ कविता,सच्चाई से मुँह फेरकर, अपना सुख और सुहाग मना सकती है.जीवन जब उसकी आँखों में आँखें डालकर देखने लगता है तब सचमुच ही, घबराहट को छोड़ उसे कोई भाव नही सूझते.

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