पुष्प की अभिलाषा
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बसंत पंचमी बहुत ही कोमल भावनाओं को प्रकट करने का एक अवसर है, सौ वर्ष की कलावधि में कितने ही साहित्यकार हुए होंगें उन्होंने कितनी ही रचनाए कि होंगीं जो आज स्मरण नही हैं और "पुष्प की अभिलाषा"क्यों स्मरण है इन दोनों के बीच जो अंतर है यदि हम समझ सकें तो हम भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे. यह विचार अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित "पुष्प की अभिलाषा "के सौ वर्ष विशेष प्रसंग और सरस्वती पूजन,साहित्यिक विमर्श का शुभारम्भ एवं बसंत उत्सव का उद्घाटन के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रकट किये. साथ ही उन्होंने "पुष्प की अभिलाषा" कविता में पुष्प के समर्पण भाव को उद्धरित करते हुए कहा की जीवन की जो सर्वोच्च अवस्था होती है वो है समर्पण, भारतीय संस्कृति और हमारे जीवन में जो सर्वोच्च अवस्था है वो समर्पण की भावना है जब तक हमें वो प्राप्त नही होती है चाहे हम किसी भी झेत्र में काम कर रहे हो तब तक जीवन में सफलता प्राप्त हुई यह माना नही जा सकता.समर्पण के अलग अलग भावों का उल्लेख करते हुए वे कहते है कि वेद का अर्थ है ज्ञान, वेदना का अर्थ है ज्ञान की अनुभूति, दूसरे के अंदर जो वेदना है जब तक वो हमारे अंदर आती है उसे कहते है संवेदना, वेद से वेदना, वेदना से संवेदना और संवेदना को जो शब्दों में उकेरता है वो ही साहित्यकार और पत्रकार है.कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे ने कहा कि पत्रकारिता का अंतिम लक्ष्य पुष्प की अभिलाषा के समान होना चाहिए, इस कार्यक्रम के आयोजन के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि जो कार्यक्रम साहित्य अकादमी को करना चाहिए वो mcu कर रहा है. अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.जी.सुरेश ने कहा कि पुष्प की अभिलाषा कार्यक्रम के तहत विश्वविद्यालय वर्ष भर अपने सभी परिसरों में विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन करेगा.

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